याकॆ निर्दयनादॆ

रचनॆ: श्री पुरंदर दासरु

राग: कांबोजि

ताळ: झंपॆ

 

याकॆ निर्दयनादॆ ऎलॊ देवनॆ            ॥प॥

श्रीकंत ऎनमेलॆ ऎळ्ळष्टु दयविल्ल         ॥अ प॥

 

कंगॆट्टु कंभदलि ऒडॆदु बळलि बंदु ।

हिंगदॆ प्रह्लादनप्पिकॊंडॆ ॥

मंगळपदवित्तु मन्निसिदॆ अव निनगॆ ।

बंगरवॆष्टु कॊट्टनु पेळॊ हरियॆ        ॥१॥

 

सिरिदेविग्हेळदॆ सॆरगु संवरिसिदॆ ।

गरुडन मेलॆ गमनवागदॆ ॥

भरदिंद नी बंदु करियनुद्धरिदॆ ।

करिराज ऎष्टु कनकव कॊट्ट हरियॆ            ॥२॥

 

अजमिळनु अण्णनॆ विभीषणनु तम्मने ।

निजदि रुक्मांगदनु निन्न मॊम्मगनॆ ॥

भजनॆगवरे हितरॆ ना निनगॆ अन्यने ।

त्रिजगपति सलहॆन्न पुरंदरविठल ॥३॥