देवरनाम: हरि हरियॆन्नलिकॆ हॊत्तिल्ल

रचनॆ: श्री पुरंदर दासरु

राग: पूर्वि

ताळ: एक

 

हरि हरियॆन्नलिक्कॆ हॊत्तिल्ल ।

नरजन्म व्यर्थवागि होगुतदल्ल        ॥प॥

 

हरिजागरणॆयल्लि पारणॆ चिंतॆ ।

निरत यात्रॆयल्लि शाकद चिंतॆ ॥

सरुत सत्कार्यदि धनद मेलिन चिंतॆ ।

पुराण केळ्वाग गृहद चिंतॆ        ॥१॥

 

कर्मदि ऒंदु चिंतॆ धर्मदि ऒंदु चिंतॆ ।

पॆर्मन माडलु बलु चिंतॆ ॥

मर्म वैरदि चिंतॆ ईर्मनस्सागॆ चिंतॆ ।

दुर्मददि नडॆय प्राणद चिंतॆ            ॥२॥

 

गंगॆ मुळुगुवाग चॆंबुमेलिन चिंतॆ ।

संगडदवरु पोगुव चिंतॆ ।

पन्नगशयन श्री पुरंदरविठलन्न ।

हिंगदॆ भजिसलु सतत निश्चिंतॆ        ॥३॥