एनु धन्यळो लकुमि

श्री पुरंदर दासरु

राग: तोडि

ताळ: रूपक

 

एनु धन्यळो लकुमि ऎंथ मान्यळो

सानुरागदिंद हरिय तानॆ सेवॆ माडु तिहळु            ॥प॥

 

कोटि कोटि भृत्यरिरलु । हाटकांबरन सेवॆ ।

साटियिल्लदॆ माडि । पूर्ण नोटदिंद सुखिसुतिहळु        ॥१॥

 

छत्र चामर व्यजन परियंक । पात्र रूपदल्लि निंतु ॥

छित्र चरितनाद हरिय । नित्य सेवॆ माडुतिहळु            ॥२॥

 

सर्वत्रदि व्याप्तनाद । सर्व दोषरहितनाद ॥

सर्व वंद्यनाद पुरंदर विट्ठलन्न सेविसुवळॊ        ॥३॥