एनायितॊ ई जनकॆ

रचनॆ: श्री पुरंदर दासरु

राग: बिलहरि

ताळ: आट

 

एनायितॊ ई जनकॆ ।

मौनवनु हिडिदु मरॆतरु हरिय        ॥प॥

 

नालिगॆ मुरिदितॊ नॆग्गिन कॊनॆमुळ्ळु ।

बालकतनदि भूत हिडियितॊ ॥

मेलॆ कॆलॆगिन तुटि ऎरडु ऒंदायितॊ ।

कालमृत्युवु बंदु कंगॆडिसितॊ        ॥१॥

 

घटसर्प कच्चि विष घनवागि एरितो ।

कटकरिसि नालिगॆ कडिद्होयितो ॥

हटदल्लि हरियन्नु नॆनॆयदॆ इरुवंथ ।

कुटिल चंचल मनसु कूडि बाधिसितॊ        ॥२॥

 

हरियॆंदरिवर शिर हरिदु ता बीळुवुदॆ ।

हरिनाम हणॆयल्लि बरॆदिल्लवॆ ॥

वरद पुरंदरविठलरायन्न ।

स्मरिसिदरॆ सिडिलॆरगि कॊल्लुवुदे            ॥३॥